हवेली की हवाबाजी

[ किबला की बहादुरी का परिचय आप देख चुके हैं कि कैसे उन्होने अपनी सलीम शाही जूती की छाप से कराची में एक घर हथियाया था. किबला की कानपुर में एक हवेली भी हुआ करती थी. हवेली क्या थी सोचें की किबला के लिये एक महल था.किबला की ना जाने कितनी यादें उससे जुड़ीं थीं. हवेली की फोटो हमेशा अपने साथ लिये घूमते थे.युसूफी साहब ने “खोया पानी” में किबला के द्वारा इस हवेली की यादों से बखूबी जोड़ा है. आइये आनन्द लें.  ]

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जिस हवेली में था हमारा घर

क़िबला ने बड़े जतन से मार्किट में एक छोटी-सी लकड़ी की दुकान का डोल डाला। बीबी के दहेज़ के ज़ेवर और वेबले स्कॉट की बन्दूक औने-पौने में बेच डाली। कुछ माल उधर खरीदा, अभी दुकान ठीक से जमी भी न थी कि एक इन्कमटैक्स इंस्पेक्टर आ निकला। खाता, रजिस्ट्रेशन, रोकड़-बही और रसीद बुक तलब कीं। दूसरे दिन, क़िबला हमसे कहने लगे ‘मियां! सुना आपने? महीनों जूतियां चटख़ाता, दफ्तरों में अपनी औक़ात खराब करवाता फ़िरा, किसी ने पलट कर न पूछा कि भैया कौन हो! अब दिल्लगी देखिये, कल एक इन्कम टैक्स का तीसमारख़ां दनदनाता आया। लक़्का कबूतर की तरह सीना फुलाये। मैंने साले को यह दिखा दी-यह छोड़ कर आये हैं। चौंक के पूछने लगा-यह क्या है! मैंने कहा हमारे यहां इसे महलसरा कहते हैं।’

सच झूठ का हाल मिर्जा जानें, उन्हीं से सुना है कि इस महलसरा का एक बड़ा फ़ोटो, फ्रेम करवा के अपने फ्लैट की काग़ज़ी-सी दीवार में कील ठोंक रहे थे कि दीवार के उस पार वाले पड़ोसी ने आ कर निवेदन किया कि कील एक फुट ऊपर ठोकिये ताकि दूसरे सिरे पर मैं अपनी शेरवानी लटका सकूं। दरवाज़ा ज़ोर से खोलने और बंद करने की धमक से इस ज़ंग खाई कील पर सारी महलसरा पेण्डुलम की तरह झूलती रहती थी। घर में डाकिया या नई धोबिन भी आती तो उसे भी दिखाते ‘यह छोड़ कर आये हैं।‘

उस हवेली का फ़ोटो हमने भी कई बार देखा था। उसे देखकर ऐसा लगता था जैसे कैमरे को मोटा नज़र आने लगा है लेकिन कैमरे की आंख की कमज़ोरी को क़िबला अपनी बातों के ज़ोर से दूर कर देते थे। यूं भी अतीत हर चीज़ के आस-पास एक रूमानी घेरा खींच देता है। आदमी का जब सब-कुछ छिन जाये तो वो या तो मस्त मलंग हो जाता है या किसी फ़ैंटैसी-लैंड में शरण लेता हैं, वंशावली और हवेली भी ऐसे ही शरण-स्थल थे। संभव है धृष्ट-निगाहों को यह तस्वीर में ढंढार दिखायी दे लेकिन क़िबला जब इसके नाज़ुक पहलुओं की व्याख्या करते थे तो इसके आगे ताजमहल बिल्कुल सीध-सपाटा, गंवारू घरौंदा मालूम होता था। मिसाल के तौर पर, दूसरी मंज़िल पर एक दरवाज़ा नज़र आता था, जिसकी चौखट और किवाड़ झड़ चुके थे। क़िबला उसे फ्रांसीसी दरीचा बताते थे, अगर यहां वाकई कोई यूरोपियन खिड़की थी तो यक़ीनी तौर पर ये वही खिड़की होगी जिसमें जड़े हुए कांच को तोड़ कर सारी-की-सारी ईस्ट इंडिया कम्पनी आंखों में अपने जूतों की धूल झोंकती गुज़र गयी। ड्योढ़ी में दाखिल होने का जो बेकिवाड़ फाटक था वो दरअस्ल शाहजहानी मेहराब थी। उसके ऊपर एक टूटा हुआ छज्जा था, जिस पर तस्वीर में एक चील आराम कर रही थी। ये राजपूती झरोखे के बाक़ी-बचे चिह्न बताये जाते थे, जिनके पीछे उनके दादा के समय में ईरानी क़ालीनों पर आज़रबैज़ानी अंदाज़ की कव्वालियां होती थीं। पिछले पहर जब नींद से भारी आंखें मुंदने लगतीं तो थोड़ी-थोड़ी देर बाद चांदी के गुलाबपाशों से महफ़िल में आये लोगों पर गुलाबजल छिड़का जाता। फ़र्श और दीवारें क़ालीनों से ढकी रहतीं। कहते थे कि जित्ते फूल ग़लीचे पे थे, वित्ते ही बाहर बग़ीचे में थे, जहां इतालवी मखमल के कारचोबी क़ालीन पर गंगा-जमुनी काम के पीकदान रखे रहते थे, जिनमें चांदी के वरक में लिपटी हुई गिलौरियों की पीक जब थूकी जाती तो बिल्लौरी गले में उतरती-चढ़ती साफ़ नज़र आती, जैसे थर्मामीटर में पारा।

वो भीड़ कि अक़्ल़ धरने की जगह नहीं

हवेली के चन्द अंदरूनी क्लोज़-अप भी थे। कुछ कैमरे की आंख के और कुछ कल्पना की आंख के। एक तिदरी थी जिसकी दो मेहराबों की दरारों में ईंटों पर कानपुरी चिडियों के घोंसले नज़र आ रहे थे। इन पर Moorish arches का अभियोग था, दिया रखने का एक ताक ऐसे आर्टिस्टिक ढंग से ढहा था कि पुर्तगाली आर्च के चिह्न दिखायी पड़ते थे। फ़ोटो में उसके पहलू में एक लकड़ी की घड़ौंची नज़र आ रही थी, जिसका शाहजहानी डिज़ाइन उनके परदादा ने बादशाह के पानी रखने की जगह से, अपने हाथ से चुराया था। शाहजहानी हो या न हो, उसके मुग़ल होने में कोई शक नहीं था, इसलिए कि उसकी एक टांग तैमूरी थी। हवेली की गर्दिशें फ़ोटो में नज़र आती थीं, लेकिन एक पड़ोसी का बयान कि उनमें गर्दिश के मारे ख़ानदानी बूढ़े रूले फ़िरते थे। उत्तरी हिस्से में एक खम्भा, जो मुद्दत हुई छत का बोझ अपने ऊपर से ओछे के अहसान की तरह उतार चुका था, Roman Pillars का अदुभुत नमूना बताया जाता था। आश्चर्य इस पर था कि छत से पहले क्यों न गिरा। इसका एक कारण यह हो सकता है कि चारों तरफ़ गर्दन तक मलबे में दबे होने की वज्ह से उसके गिरने के लिए कोई ख़ाली जगह न थी। एक टूटी दीवार के सहारे लकड़ी की कमज़ोर सीढ़ी इस प्रकार खड़ी थी कि यह कहना मुश्किल था कि कौन किसके सहारे खड़ा है। उनके बयान के अनुसार जब दूसरी मंजिल नहीं गिरी थी तो यहां विक्टोरियन स्टाइल का Grand Staircase हुआ करता था। उस छत पर, जहां अब चिमगादड़ें भी नहीं लटक सकती थीं, क़िबला लोहे की कड़ियों की ओर इशारा करते, जिनमें दादा के समय में बेल्जियम के फ़ानूस लटके रहते थे, जिनकी चम्पई रोशनी में वो घुंघराली खंजरियां बजतीं जो दो कूबड़ वाले बाख़्तरी ऊंटों के साथ आयी थीं। अगर फ़ोटो उनकी रनिंग कमेन्ट्री के साथ न देखे होते तो किसी तरह यह खयाल में नहीं आ सकता था कि पांच सौ स्क्वायर गज़ की एक लड़खड़ाती हवेली में इतनी वास्तु कला और ढेर-सारी संस्कृतियों का ऐसा घमासान का दंगल होगा कि अक़्ल धरने की जगह न रहेगी। पहली बार फ़ोटो देखें तो लगता था कि कैमरा हिल गया है। फ़िर ज़रा ग़ौर से देखें तो आश्चर्य होता था कि यह ढंढार हवेली अब तक कैसे खड़ी है। मिर्ज़ा का विचार था कि इसमें गिरने की भी ताकत नहीं रही।

जारी………………

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में

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khoya_pani_front_coverकिताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

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By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

4 comments

  1. मनीप्लांट वाली लाईन तो गजब की है, आगे का इंतजार रहेगा।

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