राजा साहब का थोबड़ा टी.वी. में.

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य व्यंग्य

नये युग के बच्चे अब नये तरीके सीखना चाहते हैं.उन्हे अब पुराने तरीको से कोई मतलब नहीं.नये युग के कुछ बच्चों को इतिहास पढ़ाना चाह रहा था.ताकि वो भी समझे कि उनके पूर्वजों ने कितने कितने त्याग किये.कितने दिन सुनहले होते होते रह गये और रातें काली हो गयी.लेकिन बच्चों की इच्छा अब इस चवन्नी छाप इतिहास जैसे विषयों में कहाँ रही.वह रातों रात प्रसिद्ध होना चाहते हैं-येन केन प्रकारेण.भले ही उसके लिये उन्हें किसी को गरिया कर उसकी वाट लगानी पड़े या फिर मालिक के सामने कुत्ते की तरह दुम हिलानी पड़े. प्रसिद्ध होने की राह यदि बदनामी के मोहल्ले से भी गुजरती हो तो भी स्वीकार्य है.

मैं बच्चों को जैनुइनली इतिहास पढ़ाना चाहता था. मैने सोचा की चलो उन्हे कोई कहानी सुनाऊं..नये जमाने के बच्चे थे ‘कहानी घर घर की’ में इंट्रस्ट रखते थे इतिहास में नहीं.मैने उन्हे पढ़ाते हुए कहा कि एक राजा था जो… एक बालक बोल उठा कि ‘ये राजा क्या होता है..??’. मैने कहा राजा याने किंग.बच्चे आजकल जो बात हिन्दी में नहीं समझते वो अंग्रेजी में आसानी से समझ जाते हैं. वो बोला अच्छा किंग यानि किंग खान यानि शाहरुख खान…मैं बोला अरे वो किंग खान नहीं बादशाह,शहंशाह..मैने उर्दूमय होना चाहा पर मनमोहनमय होकर रह गया.लड़के ने कड़कके पलटके जबाब दिया ..वो इतना जोर से बोला कि एक पल को तो मै भी ऎसे हिल गया जैसे करुणानिधि की धमकी से मनमोहन सरकार हिल जाती है…वो बोला देख बे मास्टर ठीक ठीक बता राजा मतलब बादशाह यानि शाहरुख या शहंशाह यानि अमिताभ बच्चन ….दोनों में कौन है राजा.. ? ये तो अपने आपमें एक बहस का मुद्दा था कि कौन है राजा और मैं लैफ्ट पार्टी की तरह मुद्दों में नही उलझना चाहता था.तो मैं अपने को संयत करते हुए बात को दूसरी तरफ ले गया और मेरी सरकार गिरते गिरते बची…मैं बोला कि अरे राजा.. समझो जैसे हमारे देश के राजा मनमोहन सिंह ..अरे तो बोल ना राजा मतलब बिना पैंदी का लोटा होता है.जिसकी जमीन का पता नहीं लेकिन आसमान में उड़ता है,व्यर्थ ही कुड़ता है ...मैं वाद-विवाद को संसद के नेताओं की तरह खींचना नहीं चाहता था इसलिये मैने मान लिया हाँ हाँ वही…

तो एक भूतपूर्व राजा था… भूतपूर्व बोले तो …पहले वो राजा था आजकल नहीं है ..आजकल कौन है ? किसी ने सवाल किया ..आजकल कौन है वो कहानी का हिस्सा नहीं है… ये राजा केवल नाम का राजा था यानि कि भारत की स्वतंत्रता के बाद का राजा …सरकार से कुछ रकम मिलती थी उसी से गुजर बसर होती थी..थोड़ा बहुत कमाई अपने शहर की प्रजा से लिये गये चंदे के ब्याज से हो जाती. लेकिन ठाठ बाठ वही राजाओं वाले ..यानि कड़क के बोलता मगर हड़क के रहता था.. और मूछें रखता था ..कभी कभी उन पर ताव भी देता था…

ताव मने ..?? मैने ताऊ तो सुना था ..क्या ताव और ताऊ एक ही है ?? एक जिज्ञासु बालक ने शंका जाहिर की. मैने उस बच्चे के शब्द ज्ञान की तारीफें करते हुए कहा कि नहीं बेटा ताव मतलब जैसे कभी कभी गुस्सा हो जाना …गुस्से में अंट शंट बक देना जैसे बाल ठाकरे जी बोल देते है कभी कभी..बच्चा समझ गया या फिर उसने मुझे आगे छेड़ना उचित नहीं समझा पता नहीं पर हमने अपनी कहानी आगे बढ़ायी.

एक बार राजा को जिद सवार हुई की मेरा थोबड़ा टी वी पर आना चाहिये.क्यों आना चाहिये ये नही मालूम पर आना चाहिए.अब राजा की जिद थी… आना है तो आना है..राजा भले ही भूतपूर्व था पर उसके कुछ पुराने चमचे टाइप लोग थे जो हर समय उसके साथ रहते और उसकी हर इच्छा पूरी करने की कोशिश करते.ये चमचे टाइप लोग भी अजीब होते हैं. राजा ने कहा रात है तो चमचों ने भी कहा रात है..राजा ने कहा सुहानी रात है चमचों ने भी कहा सुहानी रात है और ये सुबह सुबह की बात है..  अब राजा की औकात चमचों से थी या चमचों की औकात राजा से या फिर दोनों की कोई औकात ही नहीं थी इस बात का पता लगाना बड़ा कठिन था. 

चमचों ने इधर उधर हाथ पांव मारे.. अच्छे अच्छे चैनल के कच्चे पक्के पत्रकारों को पटाने की कोशिश की आखिर चमचों की मेहनत रंग लायी और एक पत्रकार पट ही गया..पत्रकारों को कैसे पटाया जाता है ? एक बच्चे ने जानना चाहा.. ये किसी और क्लास में पढ़ाया जायेगा.मैने उसे चुप कराया..हां तो चमचों ने पता लगाया कि अधिकतर टी वी चैनल दिल्ली में हैं तो राजा को दिल्ली जाना पड़ेगा… दिल्ली नेताओं की नगरी तो थी ही अब चैनल नगरी भी हो गयी थी….राजा पूरी तैयारियों के साथ दिल्ली पह्ंचा और उसके थोबड़े के टीवी में आने की उल्टी गिनती शुरु हो गयी. 

इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है बच्चों ने जो उत्तर दिये उनमें से प्रमुख थे.

1.हर भूतपूर्व अभूतपूर्व नहीं होता.

2.ये  चमचे बड़े काम की चीज होते हैं.इसलिये हर व्यक्ति को चमचे रखने चाहिये.
3. यदि सही तरीका अपनाया जाये तो पत्रकारों को पटाना आसान काम होता है..

काकेश

इस सीरीज के अन्य लेख : रंगबाजी का रंग बच्चों के संग

लंगी लगाने की विशुद्ध भारतीय कला

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

8 comments

  1. अच्छा है भाइ उम्मीद है ,राजा साहब की इच्छा दिल्ली मे अवश्य पूरी होगी.
    “रहिमन चमचा राखिये,साथ वक्त पर देता
    चमचा बिना ना उबरे,अफ़सर,राजा,नेता”

  2. रोचक,
    पत्रकार तो बड़े काम के जीव होते है.:)

  3. “आजा राजा बेट्टा ! अब तेरी खाट तो पत्रकार ही खडी करेन्गे “——एक बच्चा बोला ।

  4. ताव ताऊ भाव भू सब समानार्थी ही श्ब्द हैं आजकल

  5. मतिभ्रम हो रहा है – आलोक पुराणिक के ब्लॉग पर तो नहीं हैं! 🙂

  6. मेरी टिप्पणी में भू को भाऊ पढें

  7. बहुत सही, मित्र. हर भूतपूर्व अभूतपूर्व नहीं होता.
    क्या बात कही है. 🙂

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *