बीबी! मिट्टी सदा सुहागन है

व्यंग्य हो और उसमें छिपा हुआ ग़म ना हो तो फिर कैसा व्य़ंग्य. अब कौन कहेगा कि क़िबला जो इतने गुस्सैल हैं वो दिल के कितने पाक-साफ हैं. आप भी देखिये क्या है उनकी ज़िन्दगी का ग़म.

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अपाहिज बीबी और गश्ती चिलम

उनकी जिंद़गी का एक पहलू ऐसा था जिसके बारे में किसी ने उन्हें इशारों में भी बात करते नहीं सुना। हम शुरु में बता चुके हैं कि उनकी शादी बड़े चाव-चोंचले से हुई थी। बीबी बहुत खूबसूरत, नेक और सुघड़ थीं। शादी के कुछ साल बाद एक ऐसी बीमारी हुई कि कलाइयों तक दोनों हाथों से अपंग हो गयीं। क़रीबी रिश्तेदार भी मिलने से बचने लगे। रोज़मर्रा की मुलाक़ातें, शादी-गम़ी में जाना, सभी सिलसिले आहिस्ता-आहिस्ता टूट गये। घर का सारा काम आया और नौकर तो नहीं कर सकते। क़िबला ने जिस मुहब्बत और दर्दमंदी से तमाम उम्र उनकी सेवा और देख-रेख की, इसका उदाहरण मुश्किल से मिलेगा। कभी ऐसा नहीं हुआ कि उनकी चोटी बेगुंथी और दुपट्टा बेचुना हो, या जुमे को कासनी रंग का न हो। साल गुज़रते चले गये, समय ने सर पर कासनी दुपट्टे के नीचे रुई के गाले जमा दिये। मगर उनकी सेवा और प्यार में जरा जो फर्क आया हो। विश्वास नहीं होता था कि दोस्ती और मुहब्बत का यह रूप उसी गुस्सैल आदमी का है जो घर के बाहर एक चलती हुई तलवार है। ज़िंदगी भर का साथ हो तो सब्र और स्वभाव की परीक्षा के हज़ार मोड़ आते हैं, मगर उन्होंने उस बीबी से कभी ऊंची आवाज में भी बात नहीं की। कहने वाले कहते हैं कि उनकी झल्लाहट और गुस्से की शुरुआत इसी बीमारी से हुई। वो बीबी तो मुसल्ले (नमाज़ पढ़ने का कपड़ा) पर ऐसी बैठीं कि दुनिया ही में जन्नत मिल गयी। क़िबला को नमाज़ पढ़ते किसी ने नहीं देखा, लेकिन ज़िन्दगी भर जैसी सच्ची मुहब्बत और रातों को उठ-उठ कर जैसी रियाज़त (तपस्या) उन्होंने की, वही उनका दुरूद वज़ीफ़ा (एक तरह की दुआ) और वही उनकी आधी रात की दुआयें थीं। वह बड़ा बख्श़न-हार है, शायद यही उनकी मुक्ति का वसीला बन जाये। एक दौर ऐसा भी आया कि बीबी से उनकी परेशानी देखी न गयी। खुद कहा, किसी रांड बेवा से शादी कर लो। बोले, हां! भगवान! करेंगे। कहीं दो गज़ ज़मीन का एक टुकड़ा है जो न जाने कब से हमारी बरात की राह देख रहा है। वहीं चार कांधें पर डोला उतरेगा। बीबी! मिट्टी सदा सुहागन है

सो जायेंगे इक रोज़ ज़मीं ओढ़ के हम भी

बीबी की आंखों में आंसू देखे तो बात का रुख़ फेर दिया। वो अपनी सारी इमेजिरी लकड़ी, हुक्के और तम्बाकू से लिया करते थे। बोले, बीबी! यह रांड बेवा की कैद तुमने क्या सोच के लगायी? तुमने शायद वो पूरबी कहावत नहीं सुनी: “पहले पीवे भकुवा, फिर पीवे तमकुवा, पीछे पीवे चिलम चाट” यानी जो आदमी पहले हुक्का पीता है वो बुद्धू है कि दरअस्ल वो तो चिलम सुलगाने और ताव पर लाने में ही जुटा रहता है। तम्बाकू का अस्ल मजा तो दूसरे आदमी के हिस्से में आता है और जो अन्त में पीता है वो जले हुए तम्बाकू से खाली भक-भक करता है।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]

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पिछले अंक : 1. खोया पानी-1:क़िबला का परिचय 2. ख़ोया पानी 2: चारपाई का चकल्लस 3. खोया पानी-3:कनमैलिये की पिटाई 4. कांसे की लुटिया,बाली उमरिया और चुग्गी दाढ़ी़ 5. हवेली की पीड़ा कराची में 6. हवेली की हवाबाजी 7. वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है 8. इम्पोर्टेड बुज़ुर्ग और यूनानी नाक 9. कटखने बिलाव के गले में घंटी 10. हूँ तो सज़ा का पात्र, पर इल्ज़ाम ग़लत है 11. अंतिम समय और जूं का ब्लड टैस्ट 12. टार्जन की वापसी 13. माशूक के होंठ 14. मीर तकी मीर कराची में 15. दौड़ता हुआ पेड़ 16. क़िबला का रेडियो ऊंचा सुनता था

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किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

8 comments

  1. अरे भाई; सटायर करुणा/त्याग में बदल दिया और कोई अडवान्स वार्निंग भी नहीं।
    किबला का यह रूप तो विलक्षण है।

  2. बेहतरीन प्रस्तुति . मन भावुक हो गया . आदमी के कितने रूप होते हैं . कठोर आवरण के भीतर कहां एक देवता बैठा हुआ है ,किसी को नहीं पता होता . बस समय आने पर उसकी उपस्थिति महसूस कर पाते हैं .

  3. रुला ही दिए सर आप तो.
    पढ़ कर बहुत अच्छा लगा.
    हाँ एक बात और मुझे लगता है आपकी ये पोस्ट बड़े सही समय पर आई (या लाई गई) वर्तमान मे रीता भाभी द्वारा बनाईं गई खिचडी ज्ञान भइया के खा लेने से जो बवाल मचा है उस विषय पर भी ये पोस्ट बहुत कुछ कहती है.
    आपसे अनुरोध है अपने विचार प्रकट करने मे जरा और हिम्मत से काम लें.
    “खुदा करे जोर ऐ कलम और ज्यादा”

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