फ़ेल होने के फायदे

बिशारत कहते है कि बी.ए. का इम्तहान देने के बाद यह चिन्ता सर पड़ी कि अगर फ़ेल हो गये तो क्या होगा, वजीफ़ा पढ़ा तो खुदा पर भरोसे से यह चिन्ता तो दूर हो गई लेकिन इससे बड़ी एक और समस्या गले आ पड़ी कि खुदा-न-ख्व़ास्ता पास हो गये तो क्या होगा। नौकरी मिलनी मुहाल, यार दोस्त सब तितर-बितर हो जायेंगे, वालिद हाथ खींच लेंगे। बेकारी, बेरोज़गारी,बेपैशे, बेकाम…..जीवन नर्क हो जायेगा। अंग्रेज़ी अखबार सिर्फ ”वान्टेड” विज्ञापन देखने के लिये खरीदना पड़ेगा। फ़िर हर बौड़म मालिक के सांचे में अपनी क्वालिफ़िकेशन को इस तरह ढाल कर प्रार्थना-पत्र देना पड़ेगा कि हम मृत्युलोक में इसी नौकरी के लिए अवतरित हुए हैं। इक-रंगे विषय को सौ-रंग में बांधना पड़ेगा। रोज़ एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक ज़लील होना पड़ेगा, जब तक कि एक ही दफ्तर में इसकी स्थायी व्यवस्था न हो जाये। हर चंद कि फ़ॆल होने की संभावना थी मगर पास होने का डर भी लगा हुआ था। कई लड़के इस ज़िल्लत को और दो साल स्थगित करने के लिए एम.ए. और एल.एल.बी. में प्रवेश ले लेते थे। बिशारत की जान-पहचान में जिन मुसलमान लड़कों ने तीन साल पहले यानी १९२७ में बी.ए. किया था वो सब जूतियां चटखाते फ़िर रहे थे, सिवाय एक सौभाग्यशाली के, जो मुसलमानों में सर्वप्रथम आया और अब मुस्लिम मिडिल स्कूल में ड्रिल मास्टर हो गया था। १९३० की भयानक विश्व-स्तरीय बेरोज़गारी और मंहगाई की तबाहियां समाप्त नहीं हुई थीं। माना कि एक रुपये का गेहूं १५ सेर और देसी घी एक सेर मिलता था, लेकिन एक रुपया था किसके पास?

कभी-कभी वो डर-डर के, मगर सचमुच की इच्छा करते कि फ़ेल ही हो जायें तो बेहतर है, कम से कम एक साल निश्चिन्तता से कट जायेगा। फ़ेल होने पर बक़ौल मिर्ज़ा सिर्फ एक दिन आदमी की बेइज्जती खराब होती है इसके बाद चैन ही चैन। बस यही होगा ना कि जैसे ईद पर लोग मिलने आते हैं उसी तरह उस दिन खानदान का हर बड़ा बारी-बारी से बरसों की जमा धूल झाड़ने आयेगा और फ़ेल होने तथा खानदान की नाक कटवाने का एक अलग ही कारण बतायेगा। उस ज़माने में नौजवानों का कोई काम, कोई हरकत ऐसी नहीं होती थी जिसकी झपट में आ कर खानदान की नाक न कट जाये। आजकल की-सी स्थिति नहीं थी कि पहले तो खानदानों के मुंह पर नाक नज़र नहीं आती और होती भी है तो ट्यूबलेस टायर की तरह जिसमें आये दिन हर साइज के पंक्चर होते रहते हैं और अन्दर ही अन्दर आप-ही-आप जुड़ते रहते हैं। यह भी देखने में आया है कि कई बार खानदान के दूर-पास के बुज़ुर्ग छठी-सातवीं क्लास तक फ़ेल होने वाले लड़कों की, संबंधों की निकटता व क्षमता के हिसाब से अपने निजी हाथ से पिटाई भी करते थे, लेकिन जब लड़का हाथ-पैर निकालने लगे और इतना सयाना हो जाये कि दो आवाज़ों में रोने लगे यानी तेरह, चौदह साल का हो जाये तो फ़िर उसे थप्पड़ नहीं मारते थे, इसलिये कि अपने ही हाथ में चोट आने और पहुंचा उतरने का अन्देशा रहता था, केवल चीख-पुकार, डांट से काम निकालते थे। हर बुज़ुर्ग उसकी सर्टिफ़ाइड नालायक़ी की अपने झूठे शैक्षिक रिकार्ड से तुलना करता और नई पौध में अपनी दृष्टि की सीमा तक कमी और गिरावट के आसार देख कर इस सुखद निर्णय पर पहुंचता कि अभी दुनिया को उस जैसे बुज़ुर्ग की ज़ुरूरत है। भला वो ऐसी नालायक नस्ल को दुनिया का चार्ज देकर इतनी जल्दी कैसे विदा ले सकता है। मिर्ज़ा कहते हैं कि हर बुज़ुर्ग बड़े सिद्ध पुरुषों के अंदाज़ में भविष्यवाणी करता था कि तुम बड़े होकर बड़े आदमी नहीं बनोगे। साहब यह तो अन्धे को भी …हद तो ये है कि खुद हमें भी….नज़र आ रहा था। भविष्यवाणी करने के लिए सफेद दाढ़ी या भविष्यवक्ता होना आवश्यक नहीं था। बहरहाल यह सारी FARCE एक ही दिन में खत्म हो जाती थी, लेकिन पास होने के बाद तो एक उम्र का रोना था। ज़िल्लत ही ज़िल्लत, परेशानी ही परेशानी।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जायेगी]

उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से”

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

13 comments

  1. मजा आया इस कड़ी में भी: फ़ेल होने पर बक़ौल मिर्ज़ा सिर्फ एक दिन आदमी की बेइज्जती खराब होती है इसके बाद चैन ही चैन। (ये तो एकदम नया फंडा समझ आया) :)-जारी रखें.,

  2. मजा आ गया,काश पहले पता होता तो बात ही कुछ होती

  3. आदमी की बेइज्जती खराब होती है

    *****

    vaah vaah !!
    मिर्ज़ा ने सही फरमाया । मान गये ।

  4. फ़िर तो हम अपने सारे दुशमनो को आज से यही बद्दुआ देगे की वो कभी फ़ेल ना हो..:)

  5. यह कड़ी कुछ विशेष रोचक लगी। यूसुफी साहब के लेखन में दिलचस्प उपमानों की जो नायाब रेंज मिलती है, वह उनके लेखन में रोचकता को हर पल बनाये रखती है और पाठक बंधा रहता है।

  6. रोचक है, अमां कुछ साल पहले पढ़ने मिलती तो बेहतर आत्मसात होती 😉
    इंतजार रहेगा।

  7. बहुत गजब. आपकी इस प्रस्तुति का इंतजार रहता ही है. क्या खूब कही मिर्जा ने…

    वैसे आपसे प्रार्थना है कि आप मेरी पोस्ट पर कमेंट जरूर करिये नहीं तो मेरी पोस्ट फेल हो जायगी. आख़िर एक दिन की बेइज्जती भी ख़राब हुई तो भी ससुरा एक दिन का कष्ट तो रहेगा ही………:-)

  8. एक कथन है – न पढ़ते तो सौ तरीके थे कमाने के। पढ़ लिये तो नकारा हो गये हर काम से।

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