ब्लैक होल ऑफ़ धीरजगंज

बिशारत इन्टरव्यू के अन्दर दाखिल हुए तो कुछ नजर न आया।इसलिये कि केवल एक गोल मोखे के अतिरिक्त, रौशनी आने के लिए कोई खिड़की या रौशनदान नहीं था। फिर धीरे-धीरे इसी अंधेरे में हर चीज की आउट लाइन उभरती, उजलती चली गई। यहां तक कि दीवारों पर पीली मिट्टी और गोबर की ताजा लिपाई में मजबूती और पकड़ के लिये जो कड़बी की छीलन और भुस के तिनके डाले गये थे, उनका क़ुदरती वार्निश अंधेरे में चमकने लगा। दायीं तरफ़ कम-अंधेरे कोने में दो बटन चमकते नजर आये। वो चलकर उनकी तरफ़ बढ़े तो उन्हें डर महसूस हुआ। ये उस बिल्ली की आंखें थीं जो किसी अनदेखे चूहे की तलाश में थी।

बायीं तरफ़ एक चार फ़ुट ऊंची मकाननुमा खाट पड़ी थी जिसके पाये शायद साबुत पेड़ के तने से बनाये गये थे। बिसौले से छाल उतारने का कष्ट भी नहीं किया गया था। उस पर सलेक्शन कमेटी के तीन मैम्बर टांगें लटकाये बैठे थे। उसके पास ही एक और मेम्बर बिना पीठ के मूढ़े पर बैठे थे। दरवाज़े की तरफ़ पीठ किये मौलवी मुजफ़्फ़र एक टेकीदार मूढ़े पर विराजमान थे। एक बिना हत्थे वाली लोहे की कुर्सी पर एक बहुत हंसमुख व्यक्ति उल्टा बैठा था यानी उसकी पीठ से अपना सीना मिलाये और किनारे पर अपनी ठोढ़ी रखे। उसका रंग इतना सांवला था कि अंधेरे में सिर्फ़ दांत नजर आ रहे थे। यह तहसीलदार था जो इस कमेटी का चेयरमैन था। एक मैम्बर ने अपनी तुर्की टोपी खाट के पाये को पहना रखी थी। कुछ देर बाद जब बिल्ली उसके फ़ुंदने से तमाचे मार-मार कर खेलने लगी तो उसने पाये से उतार कर सर पर रख ली। सबके हाथों में खजूर के पंखे थे। मौली मज्जन पंखे की डंडी गर्दन के रास्ते शेरवानी में उतार कर बार-बार अपनी पीठ खुजाने के बाद डंडी की नोक को सूंघते थे। तहसीलदार के हाथ में जो पंखा था, उसके किनारे पर लाल गोटा और बीच में गुर्दे की शक्ल का छेद था जो उस काल में सब स्टूलों में होता था। इसका उपयोग एक अरसे तक हमारी समझ में न आया। कई लोग गर्मियों में इस पर सुराही या घड़ा रख देते थे ताकि सूराख़ से पानी रिसता रहे और पैंदे को ठंडी हवा लगती रहे। बिशारत अंत तक ये फ़ैसला न कर सके कि वो ख़ुद नर्वस हैं या स्टूल लड़खड़ा रहा है।

तहसीलदार पेड़े की लस्सी पी रहा था और बाक़ी मैम्बर हुक़्क़ा। सबने जूते उतार रखे थे। बिशारत को ये पता होता तो निःसंदेह साफ़ मोज़े पहन कर आते। मूढ़े पर बैठा हुआ मैम्बर अपने बायें पैर को दायें घुटने पर रखे, हाथ की उंगलियों से पांव की उंगलियों के साथ पंजा लड़ा रहा था। एक उधड़ी हुई क़लई का पीकदान घूम रहा था। हवा में हुक़्के, पान के बनारसी तम्बाक़ू, कोरी ठिलिया, कोने में पड़े हुए खरबूज़े के छिलकों, ख़स के इत्र और गोबर की लिपाई की ताजा गंध बसी हुई थी और उन पर हावी भबका था जिसके बारे में विश्वास से नहीं कहा जा सकता था कि यह देसी जूतों की बू है जो पैरों से आ रही है या पैरों की सड़ांध है जो जूतों से आ रही है।

जिस मोखे की चर्चा पहले की जा चुकी है उसके बारे में यह फ़ैसला करना कठिन था कि वो रौशनी के लिये बनाया गया है या अंदर के अंधेरे को कन्ट्रास्ट से और अधिक अंधेरा दिखाने के लिये रखा गया है। अंदर के धुंए को बाहर फेंकने के लिये है या बाहर की धूल को अंदर का रास्ता दिखाने के इरादे से बनाया गया। बाहर के दृश्य देखने के लिये झरोखा है या बाहर वालों को अंदर की ताक-झांक के लिये झांकी उपलब्ध कराई गई है। रौशनदान, हवादान, दर्शनी-झरोखा, धुंए की चिमनी, पोर्ट होल….बिशारत के कथानुसार यह एशिया का सर्वाधिक बहुउद्देशीय छेद था जो बेहद ओवरवर्कड था और चकराया हुआ था। इसलिये इनमें से कोई भी काम ठीक से नहीं कर पा रहा था। इस समय इसमें हर पांच मिनट बाद एक नया चेहरा फ़िट हो जाता था। हो यह रहा था कि बाहर दीवार तले एक लड़का घोड़ा बनता और दूसरा उस पर खड़ा हो कर उस वक़्त तक तमाशा देखता रहता जब तक घोड़े के पैर न लड़खड़ाने लगते और वो कमर को कमानी की तरह लचका-लचका कर यह मांग न करने लगता कि यार! उतर, मुझे भी तो देखने दे।

यदा-कदा यह मोखा ऑक्सीजन और गालियों की निकासी के रास्ते के रूप में भी इस्तेमाल होता था। इस संक्षिप्त विवरण का विस्तार यह है कि मौली मज्जन दमे के मरीज थे। जब खांसी का दौरा पड़ता और ऐसा लगता कि शायद दूसरा सांस नहीं आयेगा तो वो दौड़ कर मोखे में अपना मुंह फ़िट कर देते थे और जब सांस का पूरक रेचक ठीक हो जाता तो सस्वर अल्हम्दुलिल्लाह कह कर लौंडों को सड़ी-सड़ी गालियां देते। थोड़ी देर बाद धूप का कोण बदला तो सूरज का एक चकाचैंध लपका कमरे का अंधेरा चीरता चला गया। इसमें धुंए के बल खाते मरग़ोलों और धूलकणों का नाच देखने लायक़ था। बायीं दीवार पर दीनियात (धार्मिक विषय) के छात्रों के बनाये हुए इस्तंजे (पेशाब के बाद क़तरों को सुखाने के लिये मुसलमान मिट्टी के ढेले इस्तेमाल करते हैं, उन्हें इस्तंजा कहा जाता है) के निहायत सुडौल ढेले क़रीने से तले ऊपर सजे थे जिन पर अगर मक्खियां बैठी होतीं तो बिल्कुल बदायूं के पेड़े मालूम होते।

दायीं दीवार पर जार्ज-पांचवें की फ़ोटो पर गेंदे का सूखा खड़ंक हार लटक रहा था। उसके नीचे मुस्तफ़ा पाशा का फ़ोटो और मौलाना मुहम्मद अली जौहर की तस्वीर जिसमें वो चोग़ा पहने और समूरी टोपी पर चांद-तारा लगाये खड़े हैं। इन दोनों के बीच मौलवी मज्जन का बड़ा-सा फ़ोटो और उसके नीचे फ़्रेम किया हुआ मान-पत्र जो अध्यापकों और चपरासियों ने उनकी सेवा में हैजे से ठीक होने की ख़ुशी में लम्बी उम्र की प्रार्थना के साथ अर्पित किया था। उनकी तनख़्वाह पांच महीने से रुकी हुई थी।

ये बात तो रह ही गई। जब बिशारत इन्टरव्यू के लिये उठ कर जाने लगे तो कुत्ता भी साथ लग गया। उन्होंने रोका मगर वो न माना। चपरासी ने कहा, “आप इस पलीद को अन्दर नहीं ले जा सकते।“ बिशारत ने जवाब दिया, “यह मेरा कुत्ता नहीं है”। चपरासी बोला, “तो आप इसे दो घंटे से बांहों में लिये क्यों बैठे थे?” उसने एक ढेला उठा कर मारना चाहा तो कुत्ते ने झट पिण्डली पकड़ ली। चपरासी चीख़ने लगा। बिशारत के मना करने पर उसने फ़ौरन पिण्डली छोड़ दी। शुक्रिया अदा करने के बजाये चपरासी कहने लगा, “और आप इस पर भी कहते हैं कि कुत्ता मेरा नहीं है।“ जब वो अन्दर दाख़िल हुआ तो कुत्ता भी उनके साथ घुस गया। रोकना तो बड़ी बात, चपरासी में इतना हौसला भी नहीं रहा कि टोक भी सके। उसके अंदर घुसते ही भूचाल आ गया। कमेटी के मेम्बरों ने चीख-चीख़ कर छप्पर सर पर उठा लिया। लेकिन जब वो उनसे भी जियादा जोर से भौंका तो सब सहम कर अपनी-अपनी पिंडलियां गोद में ले कर बैठ गये। बिशारत ने कहा कि अगर आप हजरात बिल्कुल शांत और स्थिर हो जायें तो यह भी चुप हो जायेगा। इस पर एक साहब बोले आप इंटरव्यू में अपना कुत्ता लेकर क्यों आये हैं? बिशारत ने क़सम खा कर कुत्ते से अपनी असम्बद्धता प्रकट कि तो वही साहब बोले “अगर आपका दावा है कि यह कुत्ता आपका नहीं है तो आप इसकी बुरी आदतों से इतने परिचित कैसे हैं?”

बिशारत इंटरव्यू के लिये अपनी जगह बैठ गये तो कुत्ता उनके पैरों से लग कर बैठ गया। उनका जी चाहा कि वो यूं ही बैठा रहे। अब वो नर्वस महसूस नहीं कर रहे थे, इंटरव्यू के दौरान दो बार मौलवी मज्जन ने बिशारत की किसी बात पर बड़ी तुच्छता से जोरदार क़हक़हा लगाया तो कुत्ता उनसे भी जियादा जोर से भौंकने लगा और वो सहम कर क़हक़हा बीच में ही स्विच ऑफ़ करके चुपके बैठ गये। बिशारत को कुत्ते पर बेतहाशा प्यार आया।

जारी………………[अब यह श्रंखला प्रत्येक शुक्रवार और रविवार को प्रस्तुत की जा रही है.]

[उपन्यास खोयापानी की दूसरे भाग “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा से” ]

इस भाग की अन्य कड़ियां.

1. फ़ेल होने के फायदे 2. पास हुआ तो क्या हुआ 3. नेकचलनी का साइनबोर्ड 4. मौलवी मज्जन से तानाशाह तक 5. हलवाई की दुकान और कुत्ते का नाश्ता 6. कुत्ता और इंटरव्यू

पहला भाग

किताब डाक से मंगाने का पता: 

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

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चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: पुस्तक चर्चा, समीक्षा, काकेश, विमोचन, हिन्दी, किताब, युसूफी, व्यंग्य

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

5 comments

  1. अरे, भइया, तुम्‍हारे रेगुलर मुरीदन लोग गैब किधर हुए?

    वैसे यह नीचे XHTML वाली चिप्पियां बड़े काम की चीज़ लगाई हैं, कॉपी-पेस्‍ट करने के लिए अब तुम्‍हारे पेज की ही सेवायें लिया करेंगे..

  2. बढ़िया!!
    ये गुड आईडिया लग रहा है, अब से हम भी इंटरव्यू दिलाने जाएंगे तो ऐसे ही किसी कुत्ते को ले चलेंगे 😉

  3. ये कुत्ता उधार चाहिये,हमे भी कई बार ब्लोगर्स मीट मे जाना पडा जाता है ..:)

  4. मूढ़े पर बैठा हुआ मैम्बर अपने बायें पैर को दायें घुटने पर रखे, हाथ की उंगलियों से पांव की उंगलियों के साथ पंजा लड़ा रहा था। एक उधड़ी हुई क़लई का पीकदान घूम रहा था।

    क्या वर्णन है..वाह!

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