अद्भुत व्यंग्य उपन्यास:’खोया पानी’ -1

पिछ्ले दिनों मैने आपको एक विमोचन समारोह पर आधारित कार्यक्रम के बारे में बताया था.खैर वो तो व्यंग्य था आज उस दिन खरीदी गई पुस्तक की समीक्षा करते हैं.

“खोया पानी” यह है उस व्यंग्य उपन्यास का नाम जो पाकिस्तान के मशहूर व्यंग्यकार मुश्ताक अहमद यूसुफी की किताब आबे-गुम का हिन्दी अनुवाद है. इस पुस्तक के अनुवाद कर्ता है ‘लफ़्ज’ पत्रिका के संपादक श्री ‘तुफैल चतुर्वेदी’ जी. पुस्तक क्या है हास्य का पटाख़ा है और इतना महीन व्य़ंग्य की आपके समझ आ जाये तो मुँह से सिर्फ वाह वाह ही निकलती है. इस उपन्यास की टैग लाइन है “एक अद्भुत व्यंग्य उपन्यास” जो इस उपन्यास पर सटीक बैठती है.

Mushtaq_Yusufi-1हिंदी में हास्य-व्यंग्य पढ़ने वालों के मुश्ताक अहमद यूसुफी एक अनजाना नाम है. लेकिन पाकिस्तान में मुश्ताक अहमद को श्रेष्ट व्यंग्यकारों की श्रेणी में रखा जाता है. मुश्ताक अहमद यूसुफी का जन्म 4 अगस्त 1923 को टोंक , राजस्थान में हुआ. उनके पिता अब्दुल करीम खान युसुफी जयपुर नगरपालिका के अध्यक्ष रहे थे.मुश्ताक अहमद यूसुफी की प्रारंभिक शिक्षा राजस्थान में हुई. बी.ए. उन्होने राजस्थान से किया जबकि दर्शन शास्त्र में एम.ए. और एल.एल.बी. अलीगढ़ युनिवर्सिटी से की. भारत के विभाजन के पश्चात उनका परिवार करांची,पाकिस्तान चला गया.उनका विवाह इदरीस फातिमा से हुआ. उनके दो पुत्र अरशद, सरोश और दो पुत्रियां रुकसान और सीमा हैं.

उनकी अब तक चार किताबें  प्रकाशित हुई हैं. चिराग़ तले (1961), ख़ाक़म-ब-दहन (1969), ज़रगुज़स्त (1976),आबे-गुम (1990). उन्हे पाकिस्तान में सितारा-ए-इम्तियाज, और हिलाल-ए-इम्तियाज पुरुस्कार मिले हैं.

आइये अब बात करते हैं “आबे-गुम” की. 1990 में प्रकाशित इस किताब का अनुवाद “तुफैल चतुर्वेदी” ने “खोया पानी” नाम से किया है. “तुफैल” एक पत्रिका “लफ़्ज” निकालते हैं.ये उपन्यास ‘लफ़्ज’ के अंक एक से बारह में पहले छ्प चुका है. यह उपन्यास एक ओर जहां हास्य से भरा है वहीं तत्कालीन समाज khoya_pani_front_coverकी विभिन्न स्थितियों परिस्थितियों पर तीखे व्य़ंग्य के माध्यम से विहंगम दृष्टि भी डालता है. इस उपन्यास के पात्र आम जनता के पात्र हैं.उनके विचार,सोच,स्थितियां आम नागरिक की जैसी ही हैं.हाँ कहीं कहीं लेखक ने अपनी फंतासी से ऎसे रंग जरूर भरे हैं जिससे स्थितियां हास्यास्पद बन जाती हैं लेकिन यह अटपटा नहीं लगता वरन कथानक का हिस्सा ही लगता है. व्य़ंग्य लेखन में अतिशयोक्ति युक्त वर्णन होना व्य़ंग्य उभारने में सहायक होता है.कुछ ऎसे ही वर्णन इस उपन्यास में भी हैं लेकिन वो भी काफी सहज लगते हैं. ऎसा नहीं लगता कि उनके लिये कोई अतिरिक्त मेहनत की गयी हो. उपन्यास की भाषा में जो रवानगी है उसमें पाठक बस बह जाता है. उपन्यास का अनुवाद भी कुछ इस ढंग से किया गया है कि लगता ही नहीं कि ये मूल रूप से यह उर्दू का उपन्यास है. ऎसा लगता है कि यह हिन्दी में लिखा उपन्यास ही है.  

अपनी भूमिका में व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी लिखते हैं “युसुफ़ी साहब का यह उपन्यास तो जुम्लों का नायाब खजाना है और किसी भी व्यंग्यकार के लिये एक टेक्स्ट बुक की तरह भी है कि हम विश्लेषित करें कि कैसे ‘कही’ को ‘बतकही’ बनाया जा सकता है.” यह बात इस उपन्यास पर बिलकुल सही बैठती है. यह उपन्यास हिन्दी के पाठकों और व्यंग्य लेखको को किस्सागोई के नये तरीको से परिचित करवाता है.

युसुफ़ी साहब ने अपने जीवन का एक अरसा भारत में बिताया था. आजादी के बाद उन्हें पाकिस्तान जाना पड़ा. इस उपन्यास मे उनका विभाजन के समय का दर्द भी झलकता है और नॉस्टैलेजिया भी.वह इसका यथार्थपरक वर्णन भी करते हैं. एक बानगी देखिये.

पाकिस्तान बनने से पहले जिन पाठकों ने दिल्ली या लाहौर का रेलवे स्टेशन का नक़्शा देखा है, वो इस छीना-झपटी का बखूबी अंदाज़ा कर सकते हैं। 1945 में हमने देखा कि दिल्ली से लाहौर आने वाली ट्रेन के रुकते ही जैसे ही मुसाफिर ने अपने जिस्म का कोई हिस्सा दरवाज़े या खिड़की से बाहर निकाला, कुली ने उसी को मज़बूती से पकड़ कर पूरे मुसाफिर को हथेली पर रखा और हवा में उठा लिया और उठाकर प्लेटप़फार्म पर किसी सुराही या हुक़्के की चिलम पर बिठा दिया लेकिन जो मुसाफिर दूसरे मुसाफिरों के धक्के से खुद-ब- खुद डिब्बे से बाहर निकल पड़े उनका हाल वैसा ही हुआ जैसा उर्दू की किसी नई-नवेली किताब का आलोचकों के हाथ होता है। जो चीज़ जितनी भी, जिसके हाथ लगी सर पर रखकर हवा हो गया। दूसरे चरण में मुसाफिर पर होटलों के दलाल और एजेंट टूट पड़ते। सफेद कोट-पतलून, सफेद क़्मीज़, सफेद रूमाल, सफेद कैनवस के जूते, सफेद मोज़े, सफेद दांत मगर इसके बावजूद मुहम्मद हुसैन आज़ाद (19वीं शताब्दी के महान लेखक) के शब्दों में हम ये नहीं कह सकते कि चमेली का ढेर पड़ा हँस रहा है।

इस उपन्यास में पांच कहानीनुमा निबंध हैं. “हवेली” की कहानी एक क्रोधी ‘किबला’ और उसके द्वारा छोड़ी गयी पुरानी हवेली की कहानी है. “धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा” एक छोटे से कस्बे धीरजगंज के समाज,वहां स्थित एक स्कूल और उसके नये टीचर और पुराने व्यव्स्थापक का किस्सा है. “स्कूल मास्टर का ख्वाब” एक घोड़े और एक मुशी की कहानी है. जहाँ घोड़ा दुखी है और मुंशी समझदार मूर्ख. “शहरे दो किस्सा” एक सनकी आदमी का चरित्र चित्रण है जिसने अपनी ज़िंदगी के पिचहत्तर साल एक छोटे से कमरे में बिता दिये. “कार,काबुली वाला और अलादीन बेचिराग” एक रेखाचित्र है जिसमें एक अनपढ़ पठान है, एक खटारा कार है और एक ड्राइवर है.

अपनी भूमिका में डिस्क्लेमर देते हुए युसुफ़ी साहब कहते हैं.

“इस उपन्यास में जो कुछ आप पढ़ेंगे,उसका मेरे दोस्तों के जीवन की घटनाओं या उनके साथियों ,बुजुर्गों और मिलने वालों से कोई संबंध नहीं है.विनम्र निवेदन है कि फिक्सन को फिक्सन ही समझ कर पढ़ा जाये…..लगभग सारी घटनाऎं और चरित्र फ़र्जी हैं.अलबत्ता जिन प्रसिद्ध लोगों का जिक्र कहीं बुराई या आलोचना के लिये आया है.उसे झूठ ना समझा जाये.”

तत्कालीन राज्य व्यवस्था पर भी युसुफ़ी साहब चोट करते हैं. तरीका एकदम साफ़गोई का है जो सीधे दिल पर चोट करता है.

लीडर भ्रष्ट, विद्वान लोग स्वार्थी,जनता भयभीत-आतंकित और हर आदेश का पालन करने वाली.जब संस्थान खोखले और लोग चापलूस हो जायें तो जनतंत्र धीरे-धीरे डिक्टेटरशिप को रास्ता देता जाता है.

या फिर

मेरे राज्य में बोलने,छ्पने और छापने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है.मतलब ये कि जिसका जी चाहे ,जिस छ्न्द या विधा में स्तुति लिखे और पढ़े. बल्कि स्तुति-काव्य छ्न्द,बुद्धि से परे भी हो तो कोई बात नहीं.

इसे बदनसीबी ही कहना चाहिये कि जिन बड़े और कामयाब लोगों को निकट से देखने का अवसर मिला, उन्हे मनुष्य के रुप में बिल्कुल अधूरा और हल्का पाया।

य़ुसुफी साहब अरसे तक लंदन में भी रहे अंग्रेजो और लंदन के बारे में टिप्पणी भी वो अपनी भूमिका में करते हैं.

अच्छाई,सुन्दरता और शालीनता में अंग्रेजों का जबाब नहीं. धर्म.राजनीति और सैक्स पर किसी और कैसी भी सभा में बात करना अशिष्टता और परले दर्जे की बुराई समझते हैं, सिवाय पब और बार के.गंभीर और आवश्यक विषयों पर बातचीत सिर्फ नशे की हालत में ठीक समझते हैं. बेहद हमदर्द , कारवाले इतने शिष्ट कि इकलौते पैदल चलने वाले को रास्ता देने के लिये अपनी और दूसरों की राह खोटी करके सारा ट्रैफिक रोक देते हैं.

यूं लंदन बहुत दिलचस्प जगह है और इसके अलावा इसमें कोई खराबी नजर नहीं आती कि गलत जगह पर स्थित है।

एशियाई समाज से वो भलीभांति परिचित है. वो पूरी एशियाई समाज के बारे में अपनी राय देते हुए कहते हैं.

कभी कभी कोई समाज भी अपने ऊपर अतीत को ओढ़ लेता है. गौर से देखा जाये तो एशियाई ड्रामे का असल विलेन अतीत है. जो समाज जितना दब,कुचला और कायर हो उसे अपना अतीत उतना ही अधिक उज्जवल और दुहराये जाने लायक दिखायी देता है. हर परीक्षा और कठिनाई की घड़ी में वो अपने अतीत की ओर उन्मुख होता है और अतीत वो नहीं जो वस्तुत: था बल्कि वो जो उसने अपनी इच्छा और पसंद के अनुसार तुरंत गढ़ कर बनाया है.

वो व्यंग्य या व्यंग्यकार को क्या मानते हैं वो उनके इस वाक्य में झलकता है.

समय से पहले निराश हो जाने का एक लाभ यह पाया कि नाकामी और सदमे का डंक और डर पहले ही निकल जाता है. कई नामवर पहलवानों के घरानों में यह रीत है कि होनहार लड़के के बुजुर्ग उसके कान बचपन में ही तोड़ देते हैं ताकि आगे चलकर कोई प्रतिस्पर्धी पहलवान तोड़ने की कोशिश करे तो तकलीफ ना हो.व्यंग्य को मैं बचाव का मैकेनिज्म समझता हूँ.यह तलवार नहीं उस व्यक्ति का कवच है जो बुरी तरह से घायल होने के इसे पहन लेता है.  

उपन्यास ‘खोया-पानी’ बेहतरीन ज़ुमलों से भरा हुआ उपन्यास है. ऎसे ऎसे ज़ुमले की हँसी भी आये और व्य़ंग्य का ज़ायका भी मिले.

सच तो यह है कि जहां चारपाई हो वहां किसी फ़र्नीचर की न ज़रूरत है ,न गुंजाइश और  न तुक। इंग्लैंड का मौसम अगर इतना ज़लील न होता और अंग्रेज़ों ने वक़्त पर चारपाई का आविष्कार कर लिया होता तो न सिर्फ ये कि वो मौजूदा फर्नीचर की खखेड़ से बच जाते, बल्कि फिर आरामदेह चारपाई छोड़ कर उपनिवेश बनाने की खातिर घर से बाहर निकलने को भी उनका दिल न चाहता। `ओवरवर्क्ड’ सूरज भी उनके साम्राज्य पर एक सदी तक हर वक़्त चमकते रहने की ड्यूटी से बच जाता।

बहुत-सी तवायफों ने हर रात अपनी आबरू को ज़ियादा से ज़ियादा असुरक्षित रखने के उद्देश्य से इनको बतौर “पिम्प´´ नौकर रख छोड़ा था।

कई जुमले हैं

ऎसे ही जुमलों से रुबरू होंगे कल अगली पोस्ट में. यदि आप पुस्तक मगांना चाहें तो नीचे दिये पते से मंगा लें. पुस्तक की खूबियों को देखते हुए पुस्तक का मूल्य काफी कम है. मंगाते समय इस पोस्ट का ज़िक्र भी कर दें तो क्या पता ‘तुफ़ैल’ साहब कुछ विशेष डिस्काउंट की व्यवस्था कर दें यदि ना भी करें तब भी किताब खरीद कर पढ़ने योग्य तो है ही. 

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किताब डाक से मंगाने का पता:

किताब- खोया पानी
लेखक- मुश्ताक अहमद यूसुफी
उर्दू से हिंदी में अनुवाद- ‘तुफैल’ चतुर्वेदी
प्रकाशक, मुद्रक- लफ्ज पी -12 नर्मदा मार्ग
सेक्टर 11, नोएडा-201301
मोबाइल-09810387857

पेज -350 (हार्डबाऊंड)

कीमत-200 रुपये मात्र

 

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

29 comments

  1. सवेरे सवेरे बहुत मस्त किताब का पता बताया और दिल्ली को उन्मुख रहने को तत्पर हमारे कई घुमंतू छाप इंस्पेक्टरों के लिये सार्थक काम। 🙂

  2. सुन्दर समीक्षा…किताब पढ़नी ही होगी. बहुत आभार करता हूँ इस दिशा में भेजने के लिये. 🙂

  3. भैया काकेश जी,

    कमाल की लिखाई है आपकी.इतनी छोटी पोस्ट में इतना कुछ बता दिए……किताब खरीदने का जुगाड़ बैठाते हैं, आज ही.

  4. हमारी कापी कहां है? या दो सौ रुपये और नोएडा तक गाड़ी का किराया?

  5. हम्म तो फ़ुरसतिया जी के व्यंग का स्रोत यहां है हम वैसे ही बलिहारी हुए जा रहे थे। अभी जा कर खबर लेते हैं कि ये हिन्दी फ़िल्मों के जैसे कैसा जी खोया पानी से प्रेरणा ले कर लिखे हो…।:)
    देर से पोस्ट देखने का ये फ़ायदा है कि हमें किताब मगांनी नहीं पढ़ेगी न। आप यही पढ़वा देगें है न ? धन्यवाद एडवांस में।

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